Vishwakarma Puja on 16 September 2020
Vishwakarma Baba

Vishwakarma Puja Essay – विश्वकर्मा पूजा निबंध

Updated on July 6, 2020

Vishwakarma Puja Essay in Hindi

Essay #01

हिन्दू धर्म में पूजा-पाठ का विशेष महत्व होता है। त्योहारों के साथ साथ हर दिन कोई न कोई पूजा सम्पूर्ण विधि विधान से की जाती है। इन्ही त्योहारों में से एक है विश्वकर्मा महोत्सव, इस त्यौहार को विश्वकर्मा पूजा के नाम से भी जाना जाता है। हर साल 16 या 17 सितंबर को विश्वकर्मा पूजा मनाई जाती हैं। प्रत्येक वर्ष लोग यह पूजा कन्या संक्रांति के दिन मनाते हैं, क्योंकि भगवान विश्वकर्मा का जन्म भी इसी दिन हुआ था।

विश्वकर्मा पूजा क्यों मनाते हैं?

हिन्दू धर्म के लोग इस पूजा को मुख्य रूप से मनाते हैं। यह पूजा कंपनी, कार्यस्थल, कारखानों समेत फैक्टरियों में भी मनाई जाती है। यह पूजा इसलिए की जाती है ताकि इस क्षेत्र में काम कर रहे वेल्डर, मैकेनिक आदि समस्त साल अच्छे से काम करते रहे। यह त्यौहार हर साल 16 या 17 सितम्बर को पूर्वी भारत सहित बंगाल एवं ओडिशा में भी बड़ी ही धूम-धाम से मनाई जाती है। वैसे यह त्यौहार गोवर्धन पूजा के दिन भी कुछ स्थानों पर मनाया जाता हैं।

कैसे मनाते हैं विश्वकर्मा पूजा?

विश्वकर्मा पूजा करने के लिए सभी कार्यलयो और फैक्टरियों को अच्छे से साफ-सुधरा किया जाता है, और फूल मालाओं आदि से सजाया जाता है। विश्वकर्मा पूजा करने के लिए भगवान विश्वकर्मा की मूर्ति को खरीद कर लाया जाता है, और पूजा के लिए सजाया जाता है। इस पूजा में लोग अपने औजारों की भी पूजा करते है। जब पूजा संपन्न हो जाती है तो सबको प्रसाद का वितरण किया जाता है। इस दिन कार्यस्थल आदि की इंजीनियर भी पूजा करते हैं। नव-निर्मित भूमि की भी इस दिन पूजा की जाती हैं। बहुत सारे लोग उद्योगों में इस दिन छुट्टी रखते हैं।

पूजा का इतिहास

ऐसा माना जाता है कि भगवान विश्वकर्मा ने समस्त ब्रम्हांण की रचना की थी, इसका उल्लेख हिन्दू धर्म पौरोणिक कथाओं में भी किया गया हैं। यहाँ तक की पौरोणिक युग में भगवान विश्वकर्मा ने हथियारों तक का निर्माण किया था, जिसमें भगवान इंद्र का व्रज भी सम्मलित हैं। भगवान विश्वकर्मा ही एक ऐसे भगवान है जिनको वास्तुकार अपना गुरु स्वीकार कर कई युगों से उनकी पूजा करते आ रहे हैं।

निष्कर्ष

भगवान विश्वकर्मा की पूजा-अर्चना 16 या 17 सितम्बर के अलावा कुछ प्रान्तों में दिवाली महोत्सव के एक दिन बाद गोवर्धन पूजा के दिन भी बड़े धूम-धाम से की जाती है। दरअसल मान्यता अनुसार भगवान विश्वकर्मा ने अकेले ही पूरे विश्व का निर्माण किया है और इन्ही के साथ यह त्यौहार जुड़ा हुआ है।

Submitted by Aarti


Essay #02

भारतवर्ष में पूजा पाठ का अपना ही अलग महत्त्व है, प्रत्येक वर्ष भारत में अलग अलग पर्व मनाया जाता है, जिसमे से एक प्रमुख पर्व है विश्कर्मा पूजा।

हिन्दू धर्म के अनुसार भगवान विश्वकर्मा निर्माण एवं सृजन के देवता कहे जाते हैं। माना जाता है कि भगवान विश्वकर्मा ने ही इन्द्रपुरी, द्वारिका, हस्तिनापुर, स्वर्ग लोक, लंका आदि का निर्माण किया था। इस दिन विशेष रुप से औजार, मशीन तथा सभी औद्योगिक कंपनियों, दुकानों आदि का पूजा करने का विधान है। विश्वकर्मा पूजा की निश्चित तिथि को लेकर काफी भ्र्म है, कुछ लोगो द्वारा इसे दीपावली के अगले दिन मनाया जाता है, तो वही कुछ लोगो के द्वारा इंग्लिश कैलेंडर अनुसार 16 या 17 सितम्बर को मनाया जाता है। मगर अधिकांश लोग, भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को विश्वकर्मा पूजा मनाते हैं।

कौन थे भगवान विश्वकर्मा?

विश्वकर्मा यानी विश्व के निर्माण या सृजन करने वाले। माना जाता की भगवान विश्वकर्मा दिव्य वास्तुकार थे, वो वास्तुकार कलाओ में निपूर्ण थे। भगवान विश्वकर्मा ने ही कृष्ण की नगरी द्वारिका, महाभारत का हस्तिनापुर, इंद्रा का स्वर्ग लोक, रावण का लंका अदि का निर्माण स्वयं अपने हाथों से किया है।

कैसे जन्मे भगवान विश्कर्मा?

पौरोणिक कथा अनुसार भगवान विष्णु सागर में प्रकट हुए, उनके नाभि से ब्रह्मा उत्पन्न हुए, ब्रह्मा के पुत्र धर्म का विवाह वास्तु से हुआ और उनसे भगवान विश्वकर्मा ने जन्म लिया। माना जाता है की जन्मसमय से ही वो शिल्पशास्त्र के कला से परिपूर्ण थे।

कैसे करे पूजा पाठ

विश्वकर्मा पूजा के लिए व्यक्ति को प्रातः स्नान आदि करने के बाद अपनी पत्नी के साथ पूजा करना चाहिए। पत्नि सहित यज्ञ के लिए पूजा स्थान पर बैठें। हाथ में फूल,अक्षत, माला लेकर भगवान विश्वकर्मा का नाम लेते हुए घर में अक्षत छिड़कना चाहिए। भगवान विश्वकर्मा की पूजा करते समय दीप, धूप, पुष्प, गंध, सुपारी आदि का प्रयोग करना चाहिए। पूजा स्थान पर कलश में जल तथा विश्वकर्मा की मूर्ति स्थापित करनी चाहिए। विश्वकर्मा प्रतिमा पर फूल चढ़ाने के बाद सभी औजारों को तिलक लगा के पूजा करनी चाहिए।

अंत में हवन कर सभी लोगों में प्रसाद का वितरण करना चाहिए। माना जाता है की विश्वकर्मा पूजा करने वाले व्यक्ति के घर धन-धान्य तथा सुख समृद्धि में कभी कोई कमी नही रहती है। इस पूजा की महिमा से व्यक्ति के व्यापार में वृद्धि होती है तथा सभी मनोकामना पूरी हो जाती है। इस पूजा को विशेष रूप से औजार, मशीन, दुकानों, औद्योगिक कंपनी द्वारा किया जाता है। शिल्पकला से जुड़े लोग इस त्यौहार को बड़े ही धूम-धाम से मनाते हैं। सुबह सुबह दुकानों व घरो को धो कर साफ़ सुथरा किया जाता है, फिर पुरे दुकान को सजाया जाता है और शाम के वक़्त विधि विधान से पूजा किया जाता है। पूजा करने के लिए भगवान् विश्वकर्मा की मूर्तियों और तस्वीरों का प्रचलन अधिक है।

इस पूजा का महत्त्व इसलिए इतना है क्योकि मान्मायतानुसार भगवान विश्वकर्मा दुनिया के सबसे पहले इंजीनियर थे, जिन्होंने औजारों की रचना की और आद्योगिक की नीव रखी थी। भारत में इस दिन सरकारी छुट्टी रहती है और सभी दुकानों का काम भी बंद रहता है।

Submitted by Vivek Sharma


Essay #03

हिन्दू धर्म मे कोई ना कोई पूजा प्रतिदिन विधि-विधान से की जाती है। हिन्दू धर्म में अन्य पूजाओं की तरह ही विश्वकर्मा पूजा का भी विशेष महत्त्व है। प्रत्येक वर्ष 16 या 17 सितंबर को कन्या संक्रान्ति के दिन किये जाने वाला यह पूजा भगवान विश्वकर्मा के जन्म दिवस के रूप में मनाया और किया जाता है। यह पूजा विशेषत: कंपनी, कार्यस्थल, कारखानों समेत फ़ैक्टरियों में काम कर रहे वेल्डर, मैकेनिक आदि व्यक्ति द्वारा विश्वकर्मा जी की मूर्ति स्थापित कर बड़ी धूमधाम से किया जाता है। आपको बता दें कि विश्वकर्मा पूजा महज़ एक पूजा नही, बल्कि हिन्दू धर्मं में एक ख़ास त्यौहार के रूप में मनाया जाता है।

इतिहास

हिन्दू धर्म के पौराणिक कथा अनुसार ब्रह्मा के पुत्र धर्म का विवाह वास्तु से हुआ जिनसे भगवान विश्वकर्मा का जन्म हुआ। विश्वकर्मा का अर्थ है विश्व के निर्माण या सृजन करने वाले, इसलिए भगवान् विश्वकर्मा को सृष्टि का सृजनकर्ता भी कहा जाता है। पुराणों के अनुसार, भगवान विश्वकर्मा दिव्य वास्तुकार थे। ऐसा माना जाता है कि वह जन्म से ही सिल्क शास्त्र से परिपूर्ण हुए थे। उन्होंने ही इन्द्र पूरी, द्वारिका, हस्तिनापुर, स्वर्गलोक, लंका आदि का निर्माण किया था। ऐसा कहा जाता है कि संसार में इनके समक्ष कोई दूसरा शिल्पकार कभी था ही नही। पुराणों के अनुसार, विश्वकर्मा जी ही विशेष रूप से औजार, मशीन तथा सभी औद्योगिक हथियारों के निर्माणकर्ता हैं।

पूजन विधान एवं महत्व

विश्वकर्मा पूजा के दिन सभी औद्योगिक कंपनियों, कार्यालयों और फ़ैक्टरियों को अच्छे से साफ कर फूल मालाओं आदि से सजाया जाता है। फिर विश्वकर्मा पूजा करने के लिए भगवान विश्वकर्मा जी की मिट्टी की मूर्तियों को खरीद के लाया जाता है। पूजा शुरू करने से पहले पूजन स्थान पर कलश में जल तथा विश्वकर्मा जी की मूर्ति स्थापित करनी होती है। पूजा के प्रारंभ में उनकी प्रतिमा पर फूल, अक्षत, माला, सुपाड़ी आदि लेकर छिड़काव किया जाता है फिर उनकी मूर्ति के सामने दीप, धूप, गंध जलाये जाते हैं।

इस पूजा में भगवान् विश्वकर्मा की मूर्तियों और तस्वीरों के अलावा लोग अपने औजारों की भी पूजा करते है तथा नवनिर्मित भूमि की भी पूजा इस दिन करना विशेषत: शुभ माना जाता है। पूजा के अंत में सभी लोगो मे प्रसाद वितरण किया जाता है। यह माना जाता है कि विश्ववकर्मा पूजा करने वाले व्यक्ति के घर धन, धान्य तथा सुख समृद्धि की कभी कोई कमी नही रहती है। मान्यता अनुसार इस पूजा को करने से व्यक्ति के व्यापार में वृद्धि होती रहती है और उसकी सभी मनोकामनाएं पूरी हो जाती है। भारत में इस दिन सरकारी छुट्टी होती है तथा औजारों की पूजा कर दुकानों को उस दिन बंद रखा जाता है।

निष्कर्ष

यह एक धार्मिक त्योहार है और हिन्दू धर्म मे हर पर्व का विशेष महत्व है। भारत जैसे विशाल देश मे हर किसी को हर त्योहार धूमधाम से मनाने की पूर्ण अधिकार प्राप्त है। यह त्यौहार सभी त्योहारों में अनुपम होता है क्योंकि इस त्योहार में सभी शिल्प एवं वास्तुकार अपने कार्य को एक दिन का पूर्ण विराम देते है तथा अगले दिन विश्वकर्मा जी की मूर्ती का विषर्जन करते हैं। उसके तत्थ पश्चात कार्य पूनः शुरु करते हैं।

Submitted by Shweta Tiwari


Vishwakarma Puja Essay in English

In September, at the Vishwakarma, which is specially dedicated to the household gods, as represented by the tools of the artisan and agricultural implements of the farmer.

The farmer sets up his plow and his spade in a place carefully purified by a layer of cow dung and prostrates before them. The meson offers similar homage to his trowel and his square; the carpenter to his axe, his saw, and his plane; the barber to his razor; the writer to his pen, the tailor to his scissors and needless, the fisherman to his nets; the weaver to his loom, the butcher to his cleaver and so on in the case of all craftsmen. The women also collect their baskets, rice mills, and cooking utensils and do worship to them.

Vishwakarma is the architect of Gods, who is said to have built all divine constructions and hermitages. This worship is dedicated to him. It is celebrated on a grand scale in Bengal, mainly; when all engineering works are closed for the day, and all craftsmen lay down their tools, observe the day as a holiday, worship the deity builder. The owners distribute sweets and give prizes after worship of the tools and implements.

Neel was the son of Vishwakarma, whose services were utilized by Lord Rama in building the bridge across the sea to reach Lanka, in the Ramayana.

Submitted by Rajesh

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