Vishwakarma Puja on 16 September 2020
Vishwakarma Baba

Vishwakarma Puja Katha (Story) – विश्वकर्मा पूजा कथा

Updated on July 6, 2020

श्री विश्वकर्मा पूजा कथा

पहला अध्याय

एक समय में सभी ऋषिगण धर्मक्षेत्र-रूपी कुरक्षेत्र में एकत्र होकर पुराणों के मर्म जानने वाले धर्मज्ञ सूतजी से पूछा ॥१॥

ऋषियों ने कहा– हे पुराण-प्रवीण! हे महाभाग! मुझे अचानक एक सन्देह उत्पन्न हो गया है, आप उसे समझाकर दूर कीजिए ॥२॥

अतुल तेजस्वी श्रीविष्ण भगवान्‌ के अनेक रूपों का वर्णन मैंने सुना है, किन्तु यह नहीं जानता कि, उनमें सर्वश्रेष्ठ कौनें है? कृपा कर हमें इस भेद को बतलाइए? ॥३॥

श्री सूतजी ने कहा– हे मुनिगणो! संसार-हित के लिए सर्वोत्तम शुभकर प्रश्नों को आपलोगों ने पूछा हैं, उसके लिए मुझको बड़ी प्रसन्नता है ॥४॥

हे तपोधनो! जगत्पूज्य, जगत्पति श्रीविष्णु भगवान्‌ के अनेक रूप हैं, उनमें सर्वश्रेष्ठ रूप को आदरपूर्वक सुनिए ॥५-६॥

जिनके स्मरण मात्र से बड़े-बड़े पापीजन भी पापमुक्त हुए, इसमें कुछ भी सन्देह नहीं है ॥७॥

इसी प्रश्न को एक बार क्षीर समुद्र में श्रीलक्ष्मीजी ने भगवान्‌ विष्णु से पूछा था ॥८॥

लक्ष्मीजी ने कहा– हे जगन्नाथ! भक्तजन आपके अनेक रूपों की भक्तिपूर्वक पृथ्वी पर पूजा करते हैं ॥९॥

हे स्वामी! वे सब रूप समान ही हैं या मुख्य और गौण के विचार से भेद भी है ॥१०॥

भगवान्‌ विष्णु ने लक्ष्मीजी से कहा– हे प्रिये! जब मैं योगमाया के साथ समूचे ब्रह्माण्ड को अपनी आत्मा में समेट लेता हूँ, तब मैं अनेक रूप धारण करूँ इस तरह की इच्छा रखता हुआ जीवों को कर्म भोग के लिए क्षण-भर में असंख्य लोकों को जिस रूप से रचना करता हूँ, उस रूप को कहता हूँ, तुम ध्यान से सुनो ॥११-१३॥

हे देवि! चारों तरफ से प्रकाशित करता हुआ अनेक सूर्यों के तुल्य चमकने वाला विश्वकर्मा का रूप धारण करता हूँ एवं उसके बाद नर-सृष्टि करने की इच्छा करता हुआ पहले तपस्वी ब्रह्मा को रचता हूँ ॥१४-१५॥

उस ब्रह्मा को, स्तुति, यज्ञ, गान के प्रकाशन करने वाले ऋग्‌, यजु: और सामवेद का उपदेश करता हूँ ॥१६॥

इसी प्रकार शिल्प विद्या के प्रतिपादक अथर्ववेद को भी प्रदान करता हूँ। इसी वेद द्वार शिल्पियों ने अनेक वस्तुओं की रचना की है ॥१७॥

हे महेश्वरि! सभी रूपों में यही मुख्य रूप है, जिसने सारी सृष्टि को क्षणभर में निर्माण किया ॥१८॥

जो मनुष्य इस अद्भुत रूप को क्षण भर भी ध्यान करता है, उसका सभी विघ्न नाश हो जाता है। जो शिल्पी श्रीविश्वकर्मा भगवान्‌ का ध्यान करता है, उसका समूचा दुःख दूर हो जाता है ॥१९-२०॥

इस प्रकार पहला अध्याय समाप्त ॥१॥

दूसरा अध्याय

सूतजी ने कहा– इसी प्रकार त्रिलोक के स्वामी श्रीविष्णु भगवान्‌ ने लक्ष्मीजी से अपने रूप का वर्णन कर चुप हो गये ॥१॥

ऋषियों ने कहा– सभी धर्मों को जानने वाले, वक्ताओं में श्रेष्ठ हे महात्मा सूतजी! यह अद्भुत रहस्य को आपने कैसे जाना, केसे संसार म यह रूप पूज्य हुआ और संसार में प्रचलित हुआ? ॥ २- ३॥

महर्षियों के उत्तर में श्रीसूतजी ने कहा– हे मुनिगण! जिस प्रकार से देश के कल्याण कारक समाचार को मैंने सुना, उसे सुनिए ॥ ४॥

महर्षि अंगिरा नाम के एक ऋषि थे, वे हिमालय पर्वत के निकट गंगा तट पर बैठकर तपस्या किया करते थे ॥५॥

वर्षाकाल में बाहर बैठकर, जाड़े के दिन में ठंढे जल में और गर्मी के दिन में धूप में बैठकर तपस्या करते थे, किन्तु फिर भी उनके चित्त में शान्ति न मिली। वें प्यासे मृग के समान दौड़ने लगे ॥ ६-७॥

उस समय एकाएक आकाशवाणी हुई कि, हे तपोधन! तुम लक्ष्य से भ्रष्ट होकर बेकार श्रम कर रहे हो ॥८॥

जैसे निशान से चुका हुआ बाण लक्ष्य को नहीं काट सकता। वही दशा तुम्हारी हो रही है और लोक में उपहास हो रहा है ॥९॥

उत्पत्ति और संहार करने वाले, संसार में विख्यात, अभीष्ट फल को देनेवाले महातेजस्वी, जिनके पाँच मुख और दस हाथ हैं, सरस्वती एवं महारानी लक्ष्मी से पूजित भगवान्‌ श्रीविश्वकर्मा की तुम पूजा और ध्यान करो ॥१०-१ १॥

इस रूप को स्वयं विष्णु भगवान्‌ ने क्षीर सागर में मुझसे कहा था, जिसके ध्यान से आज भी शरीर रोमांचित हो जाता है ॥१२॥

अमावस्या तिथिं को सभी कार्य छोड़कर विधि पूर्वक पूजा करो ॥१३॥

ऐसी आकाशवाणी सुनकर अंगिरा मुनि सन्देह में पड़कर ध्यानस्थ हुए ॥१४॥

श्रीविश्वकर्मा भगवान्‌ के ध्यान से उनके चित्त में शिल्पशाख्र का भण्डार अर्थ सहित अधर्ववेद का ज्ञान हुआ ॥१५॥

इसी तत्त्वज्ञ मुनि अंगिरा ने अपनी बुद्धि से विमान आदि वस्तुओ का आविष्कार किया ॥१६॥

श्रीविश्वकर्मा भगवान्‌ को कृपा में ही यह जगत्‌ सुखी हुआ, क्योंकि उन्हीं की कृपा से गाड़ी आदि बनाने के ज्ञान का प्रसार हुआ । तभी से यह श्रीविश्वकर्मा भगवान्‌ का रूप संसार मैं प्रसिद्ध हुआ और परम्परा क्रम से यह कथा मुझे मालूम हुई ॥१७-१८॥

हे मुनियो! जो मनुष्य इस कथा को सुनते हैं, उन्हें श्रवण मात्र से ही ज्ञान होता है ॥१९॥

यह महाज्योति रूप है, जो संसार का हितकारी है। वह मनुष्य पापी और कृतष्न है, जो इनका पूजन और ध्यान नहीं करता ॥२०॥

इस प्रकार द्वितीय अध्याय समाप्ता ॥२॥

तीसरा अध्याय

ऋषियों ने कहा– हे सूतजी! आपसे विश्वकर्मा भगवान्‌ के चर को सुनकर अभी हम लोगों के चित्त की तृप्ति नहीं होती है, जैसे देवताओं को अमृत से तृप्ति नहीं होती॥१॥

इस समय भगवान्‌ के चरित्र को सुनने की इच्छा ऐसी बढ़ रही है, जेसे हविष्य देने से अग्नि की वृद्धि होती है ॥२॥

सूतजी ने कहा– हे मुनिसत्तम! जगद्गुरु सच्चिदानन्द भगवान्‌ श्रीविश्वकर्मा के सुमनोहर कथा को सावधान होकर आप लोग सुनिए ॥३॥

पूर्वकाल में प्रमंगद नामक एक राजा थे, जो अपने पुत्र के समान प्रजाओं का पालन करते थे। आलस्य त्यागकर धर्मकार्य किया करते थे ॥४॥

प्रेम के साथ प्रजाओं पर शासन करते थे, तलवार आदि शख्र से कभी शासन नहीं किया ॥५॥

दरिद्रता से दुःखी मनुष्य मेरा शासन मानेंगे, यह उनकी नीति नहीं थी। सर्वदा प्रजाओं को सुखी बनाने में तल्‍लीन रहा करते थे॥६॥

अपात्रों को दान देना, वे दुष्ट की रक्षा करना मानते थे। अत: कृतष्न और द्रुस्टो के अभाव से उनका राज्य सुखी था ॥७॥

उनके कमल के समान आँखवाली, साक्षात्‌ सती स्वरूप विदुषी, धर्म-कर्म और ब्रत करने में श्रद्धा रखनेवाली कमला नाम की ख्री थी ॥८॥

उस प्रजापालक धर्मात्मा राजा के शरीर में दुर्भाग्यवश बहुत कष्ट देने वाला कुस्त रोग हो गया ॥९॥

अनेक चिकित्सा करने पर भी रोग दूर नहीं हुआ। रोग से पीड़ित राजा बहुत दुःखी हुआ ॥१०॥

सूतजी के कथनानन्तर ऋषियों ने कहा- हे सुदर्शन! आपकी आज्ञा से शासन करने वाले महात्मा राजा को यह पाप-रोग कैसे हुआ? ॥११॥

ऐसे धर्मात्माओं को भी जब रोग हो जाता है, तब फिर संसार में धर्म पर कौन विश्वास करेगा १२॥

सूतजी ने कहा– वह राजा पहले नास्तिक मत का प्रचार करता था। लोगों में उपदेश करता था कि, यह संसार अनादि है। इसका रचयिता विश्वकर्मा आदि कोई नहीं है॥ १३-१४॥

संसार को कर्मफल देने वाले यदि विश्वकर्मा नहीं हैं तो मनुष्य उपकार से उत्पन्न पुण्य-फल को कैसे प्राप्त कर सकता है॥१५॥

यदि परोपकारी को पुण्य-फल नहीं मिलेगा, तो किसी का उपकार कैसे करेगा, ऐसा होने से संसार नाश हो जायेगा। इस हेतु पाखण्डियों को दण्ड अवश्य मिलता है॥१६॥

अनेक जन्मों के पाप और पुण्य का फल एक जन्म में नहीं मिलता, इसमें सन्देह मत करो। अब आगे की कथा कहता हूँ, आप लोग सावधान चित्त होकर सुनें १७॥

राजा को अत्यन्त खित्र है देखकर दुःखी मन से रानी बोली॥१८॥

रानी ने कहा– हे राजन्‌! महातेजस्वी पुरोहित उपमन्युजी भी आँख की बीमारी से अन्धे हो गये थे॥१९॥

उपमन्यु पुरोहित ने ज्ञान बल से अमावस्या के दिन ब्रत कर भगवान्‌ विश्वकर्मा की पूजा करना ठीक समझा॥२०॥

पूजन के दिन उपमन्यु पुरोहित ने एक शाम फलाहार किया और सभी कामों को छोड़कर भगवान्‌ विश्वकर्मा की पूजा करना प्रारम्भ किया॥२ १॥

उसी ब्रत के प्रभाव से उनको दिव्य-दृष्टि हो गयी, जो आज वृद्धावस्था तक उनकी दृष्टि ज्यों-की-त्यों है ॥२२॥

हे महाराज! मैं नप्रभाव से प्रार्थना करती हूँ कि, आप भी दीनपालक भगवान्‌ विश्वकर्मा की शरण में जायें २ ३॥

राजा ने कहा– हे प्रिय! तुमने ठीक कहा, इसको सुनकर मेरे चित्त में बहुत उत्साह हो रहा है और निश्चय है कि यह काम भगवान्‌ विश्वकर्मा की कृपा से अवश्य सफल होगा। यह चित्त के उत्साह से ही मालूम होता है॥२४॥

सूतजी ने कहा– उसी दिन से वह राजा प्रत्येक अमावस्या को विश्वकर्मा भगवान्‌ का पूजन सभी कार्यों को छोड़कर करने लगा॥२५॥

पूजन के प्रभाव से राजा शीघ्र की कुष्ठ रोग से मुक्त होकर स्वर्ण सढ़श दिव्य शरीर वाला हो गया और सुख पूर्वक राज-भोग करने लगा॥२६॥

उस समय से वे राजा भगवान्‌ विश्वकर्मा के चरण-कमल में भौंरे के समान लीन रहने लगे अर्थात्‌ कभी नहीं भूले॥२७॥

जो मनुष्य प्रतिदिन प्रेम पूर्वक भगवान्‌ विश्वकर्मा का श्रद्धा-भक्तिपूर्वक ध्यान-पूजन करता है, वह सभी रोगों से मुक्त होकर अन्त में मोक्ष पद को प्राप्त करता है॥२८-२९॥

इस प्रकार तृतीय अध्याय समाप्त ॥३॥

चौथा अध्याय

पुन: सूतजी ने कहा– हे मुनियो! मैंने आपलोगों को श्रीविश्वकर्मा भगवान्‌ के अद्भुत चरित्र को सुनाया। अब जगत को चकित करने वाले चखि का वर्णन करता हूँ ॥१॥

वाराणसी पुर नामक ग्राम में जगत्‌ के धार्मिक व्यवहार से चलनेवाला एक रथकार अपनी स्त्री के साथ रहता था ॥२॥

अपने कार्य में निपुण वह विद्वान रथकार जीवन निर्वाह योग्य वृत्ति के लिए व्यग्र होकर घूमा करता था ॥३॥

इस प्रकार श्रगाल की भाँति घूम-घूम कर प्रयत्न करते रहने पर भी भोजन से अधिक धन न प्राप्त नहीं कर पाता था ॥४॥

उसकी स्त्री भी पति की तरह, पुत्र न रहने के कारण सदा चिन्तित रहती थी और वह इसलिए कि भुढ़ापा कैसे निभेगा ॥५॥

इस प्रकार चिन्तातुर होकर वह पुत्र-प्राप्ति के लिए मठों में जाकर महन्तों से आशीर्वाद लिया करती थी ॥६॥

सन्तान-प्राप्ति के लिए कभी-कभी दाढ़ी-मुँछ वाले धू्तों के पास जाया करती अर्थात्‌ भेदभाव को छोड़कर सभी प्रकार के साधु-सन्तों के पास जाती थी, फिर भी नानाविध तंत्र-मन्त्रादि द्वारा उपाए करने पर भी उसकी कामना पूरी नहीं हुई ॥७॥

कभी काश-कुश के जंगलों में और कभी यमुना के बालू में जल के भ्रम में दौड़ती हुई हरिणी की तरह उसकी दशा हो रही थी ॥८॥

कोई धूर्त मोर के पंखों से और कोई भोजपत्र पर यन्त्र लिखकर और अपने को तांत्रिक और ओझा कहकर कि, मेरे ऊपर अमुक देवता आते हैं, तुम्हारा मनोरथ पूर्ण कर देंगे। ऐसा कहकर विभूति दिया करते थे॥९-११॥

इस प्रकार सन्तान-प्राप्ति की चिन्ता से चिन्तित होकर दोनों खरी-पुरुष बहुत दुः:खित रहा करते थे। धूर्तों की लीला से विशाल माया-जाल में फँसते देख कर एक पड़ोसी ब्राह्मण ने कहा॥१२॥

ब्राह्माण ने कहा– हे रथकार! सन्तान के लिए इधर-उधर क्यों भटकता फिरता है। मेरी समझ में तुम भारी मूर्ख मालूम पड़ते हो॥१३॥

इन झूठे उपायों से सुख-प्राप्ति के लिए कभी सन्तान या धन प्राप्त नहीं हो सकता। यह सब परिश्रम बेकार है॥१४॥

वे मनुष्य महामूर्ख हैं जो ऐसे झूठे उपायों से अपने मनोरथ को पूरा करना चाहते हैं। व्यर्थ उद्योग से कार्य सफल नहीं हो सकता है॥१५॥

ऐसे लोगों से अधिक मूर्ख वे हें, जो म्लेच्छों के झाड़-फूँक की अग्नि-ज्वाला से पुत्रों को दीर्घायु होना समझते हैं॥१६॥

म्लेच्छों के फूँक से दग्ध कुमाता के पुत्रों को धर्मशास्रानुसार अच्छी बुद्धि नहीं हो सकती॥१७॥

अत: तुम व्यर्थ के उपायों को त्यागकर केवल परम दयालु भगवान्‌ विश्वकर्मा की शरण में जाओ १८॥

हे रथकार! उनकी कृपा से तुम्हारा कार्य अवश्य सफल होगा। बिना भगवान्‌ विश्वकर्मा की कृपा से कोई भी कष्ट-मुक्त नहीं हो सकता॥१९॥

कर्मों के फल देने में भगवान्‌ विश्वकर्मा स्वतंत्र हैं। आगे-पीछे करके सुख और दु:ख दिया करते हैं॥२०॥

यदि यह दुरवस्था तुम्हारे कुकर्मों का फल है, तो भगवान्‌ विश्वकर्मदेव इस दुःख से उद्धार कर दूसरी योनि में अवश्य देगा, क्योंकि वह सर्वशक्तिमान्‌ है और अपने निष्कपटी भक्तों को अन्य योनि में देता है॥२१॥

ईधर कर्मों के फल (सुख-दुःख) देता है उसके साधन अनेक हैं। दुःख देने के लिए नि:सम्तान या निर्धन बनाना साधन नहीं है ॥२२॥

अतः सभी कर्मो को छोड़ अमावत्स्या के दिन व्रत कर, भगवन विश्वकर्मा का पूजन कर, उनके माहात्म्य सुनो और यथाशक्ति परोपकार में धन खर्च किया करो ॥२३-२४॥

महात्मा ब्राह्मण के मुख से ऐसा उपदेश सुनकर रथकार की आँखें खुल गयीं ॥२५॥

परोपकारी ब्राह्मण के चरणों को प्रणाम कर भगवान्‌ विश्वकर्मा का ध्यान करता हुआ अपने घर को गया ॥२६॥

उस दिन से धर्मात्मा रथकार श्रीविश्वकर्माजी के चरणकमलों का ध्यान करनें लगा ॥२७॥

और उसकी स्त्री भी झुठे उपायों को छोड़ भगवान्‌ के गुणों में भक्ति करने लगी ॥२८॥

अमावस्या तिथि को विधि-विधान से प्रत करने से रथकार अतिशीघ्र धनवान्‌ और पुत्रवान्‌ हो गया ॥२९॥

उस दिन से उसका कोई दिन भी बिना आमदनी का नहीं जाने लगा ॥३०॥

उसका पुत्र सुशील, गुणी, विद्वानू, सन्ध्यावन्दन करने वाला और माता-पिता का परम भक्त हुआ ॥३१॥

इस प्रकार दोनों स्त्री-पुरुष गृहत्स्य धर्म का पालन करते हुए सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करने लगे ॥३२॥

जो मनुष्य भगवान्‌ विश्वकर्मा का पूजन कर ध्यान करता है, वह जीवन पर्यन्त पुत्र-कलत्र के साथ सुखी रहता है ॥३३॥

इस प्रकार चतुर्थ अध्याय समाप्त ॥४॥

पांचवा अध्याय

श्रीसूतजी ने कहा– हे महर्षियो! विध-विख्यात श्रीविश्वकर्मा भगवान्‌ का माहात्म्य आप लोगों से पुन: मैं कहता हैं, आप लोग ध्यान से सुनें ॥१॥

उज्जैन नगरी में प्रतिष्ठित और उदार बुद्धि का एक धर्मात्मा सेठ रहता था ॥२॥

उसका खजाना कुबेर के भण्डार सद्श मणिमाणिक्य से सदा भरा रहता था ॥३॥

उसके आस-पास कोई भी ऐसा मनुष्य न था, जो विवाह कार्य हेतु, मामला-मुकदमा लड़ने या रोग-संकट से मुक्ति के लिए उससे धन न लिया हो ॥४॥

परोपकार में धन खर्च हो जाने पर वह सेठ दरिद्र होकर पंक में फँसे हुए हाथी की तरह दुःख पाने लगा ॥५॥

उस सेठ को पूरा भरोसा था कि, उपकृत मित्र हमारी सहायता अवश्य करेंगे ॥६॥

किन्तु उसको आशा व्यर्थ हुई। कोई भी कृतधन मित्र उसको सहायता पहुंचाने को तैयार नहीं हुए ॥७॥

धनहीन होते ही उसके मित्र कुछ ही दिनों में शत्रु बन गये और उसकी निंदा करने लगे ॥८॥

उसके पहले के मित्र सेठ को देखते ही आँख बचाकर चल देते, क्योंकि स्वार्थी मित्र आपत्तिकाल में साथ नहीं देते ॥९॥

ऐसी नीच प्रवृत्ति वाले मनुष्यों के व्यवहार से सेठ को संसार से विरक्ति और घृणा हो गयी ॥१०॥

वह कृतष्नों के मुख पर थूकते हुए अपने नगर को छोड़कर जंगल में चला गया ॥११॥

कन्द-मूल, फल खाकर वह अपना जीवन व्यतीत करने लगा। जंगल में संयोग से किसी मनुष्य को देख लेता तो घृणावश उसे देखते ही दूर भाग जाता था ॥१२॥

एक बार घूमते-घूमते सेठ निर्जन वन में चला गया और वहाँ देखा कि पर्वत की गुफा में पद्यासन लगाये शान्त्‌ चित्त से बैठे लोमश मुनि तपस्या कर रहे हैं ॥१३॥

सेठ ने मुनि को पशु समझकर उनके समीप जाकर तमाशे की इच्छा से बैठ गया ॥१४॥

सेठ को समीप में बैठे हुए देखकर मुनि ने पूछा- कुशल तो है? किधर से घूमते हुए पधारे हो? ॥१५॥

पशु को मनुष्य की भाषा बोलते देखकर सेठ को बड़ा सन्देह होने लगा। प्रश्न किये जाने पर वह आदि से अन्त तक का वृत्तान्त उन महर्षि से कह सुनाया ॥१६॥

इतना सुनकर मुनिवर ने सेठ से कहा कि, यदि तुमको पापियों और कृतष्नों से घृणा है तो फिर विश्वकर्मा भगवान्‌ से विमुख क्यों हो? ॥१७॥

हे सेठ! सभी सुखों को भोगने वाले उसी देव ने तुमको रचा है ॥१८॥

जिसने समूचे संसार को रच कर कर्मानुसार व्यवस्था की है। उनको त्याग कर तुम कैसे सुखी हो सकते हो? ॥१९॥

नास्तिक और कृत्धन उपकारी मनुष्य पहले परमात्मा को भूल जाता है। अत: जद त शक्तिशाली विश्वकर्मा भगवान्‌ की शरण में जाओं ॥२०॥

ऊर्ध्वमूल जगत्‌ के कर्ता भगवान्‌ विश्वकर्मा के अनेक रूप हैं। दो बाहु, चार बाहु और दश बाहु तथा एक मुख, चार मुख और पाँच मुख का रूप है ॥२१-२२॥

मनु, मय, त्वष्टा, शिल्पी और दैवज्ञ नामक इनके पाँच पु हैं ॥२२॥

इनमें मनु ने लोहे का, मय ने लकड़ी का, त्वष्टा ने काँसे और ताँबे का काम बनाया। शिल्पी ने ईंट और दैवज्ञ ने सोने चाँदी का काम किया। यही है मनु के पाँचो पुत्रो के कर्म। इसी को यज्ञ-कर्म कहते है ॥२३॥

सेतु-बंधन के समय में रामचन्द्र ने भी भगवान्‌ विश्वकर्मा का पूजन किया ॥२६॥

द्वारका निर्माण के समय श्रीकृष्णचन्द्र ने भगवान्‌ विश्वकर्मा की पूजा की थी ॥२७॥

इसलिए, तुम भी उनकी पूजा करो, समस्त कष्टों से मुक्त होकर सभी सिद्धियों को पा जाओगे ॥२८॥

मुनि के उपदेश से सेठ को अत्यधिक शान्ति मिली और उस दिन से श्रीविश्वकर्मा का भक्त बन गया ॥२९॥

उनके आराधन-पूजन से उसका सभी पाप दूर हो गया और अन्त में देवत्व प्राप्त करके स्वर्ग में सुख करने लगा ॥३०॥

जो मनुष्य भक्तियुक्त चित्त से भगवान्‌ विश्वकर्मा का ध्यान करता है, वह उनके चरण-कमलों की भक्ति प्राप्ति करता है ॥३१॥

श्रीविंश्वकर्मा के पवित्र यश को जो बुद्धिमान्‌ मनुष्य सुनता है, वह पृथ्वी के सभी सुखों को प्राप्त कर अन्त में भगवान्‌ विश्वकर्मा के शाश्वत पद को प्राप्त करता है ॥३२॥

इस प्रकार पद्टम अध्याय समाप्त ॥५॥

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